आर्ष गुरुकुल दयानंद वाणी जरैल मधुबनी का विशाल वृक्षों से हरा भरा परिसर । सात्विक भोजन। तपस्वी तथा विद्वान गुरुजन । शारीरिक शक्ति के विकास के साथ ही आत्मिक उन्नति के विकास की सच्ची दिशा प्रदर्शित करने वाला आर्ष पाठविधि का सुप्रसिद्ध अध्ययन अध्यापन केन्द्र | सुविधापूर्ण गौशाला
प्राचीन मिथिला क्षेत्र के मधुबनी जिले में आर्य समाज बड़ा बाजार, कोलकाता की प्रेरणा तथा आर्य समाज कोलकाता, हावड़ा एवं अन्य सहयोगियों के सहयोग से जनवरी 1991 से वेद प्रचार का कार्य प्रारंभ हुआ। प्रारंभिक चरण में अनेक आर्य समाज सेवकों के आर्थिक सहयोग से यह अभियान आगे बढ़ा। विद्यालयों को प्रचार का मुख्य केंद्र बनाकर निरंतर वेद प्रचार किया गया।
इसी अथक प्रयास और स्थानीय गणमान्य व्यक्तियों के सहयोग से 27 मई 1995 को त्रिदिवसीय स्थापना समारोह के साथ आर्ष गुरुकुल दयानंद वाणी की स्थापना हुई। इस अवसर पर पंडित गंगाधर शास्त्री, पंडित नवल किशोर शास्त्री, डॉ. व्यासनंदन शास्त्री, श्री कमलेश दिव्यदर्शी, श्री जयपाल सिंह, श्री रामप्रसाद, श्री कपिल शर्मा, श्री ब्रजनंदन तथा नेपाल से ब्रह्मचारी वेदबन्धु सहित अनेक विद्वानों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण अतिथियों का समुचित सत्कार एवं दक्षिणा देना संभव नहीं हो सका, फिर भी ब्रह्मचारी वेदबन्धु जी लगभग पंद्रह दिनों तक वहीं रहकर विद्यालय प्रचार, प्रातः भ्रमण, बच्चों को योग-व्यायाम का प्रशिक्षण तथा आर्य समाज के सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार में निरंतर योगदान देते रहे। गुरुकुल की स्थापना में स्थानीय आर्य विद्वान श्री अर्जुन प्रसाद शास्त्री तथा सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक डॉ. रामावतार यादव का विशेष एवं अविस्मरणीय योगदान रहा।
गुरुकुल का मुख्य द्वार, जरैल, मधुबनी
गुरुकुल का श्रुति भवन, जरैल, मधुबनी
महर्षि दयानंद सरस्वती जी सदैव यह मानते थे कि संस्कृत भाषा का लोप संपूर्ण मानवता के लिए घातक सिद्ध होगा। उन्हीं के इस दूरदर्शी विचार से प्रेरित होकर संस्कृत भाषा तथा संस्कृत विद्या के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु इस गुरुकुल की नींव रखी गई। यहाँ देववाणी संस्कृत के माध्यम से वेद, ब्राह्मणग्रन्थ, दर्शन, उपनिषद्, निरुक्त एवं व्याकरण जैसे विषयों का अध्ययन-अध्यापन महर्षि दयानन्द द्वारा प्रतिपादित पद्धति से कराया जाता है। इसके साथ ही प्राचीन आश्रम-व्यवस्था के अनुरूप नियमित दिनचर्या का पालन करवाते हुए विद्यार्थियों को बलशाली, सदाचारी, धर्मपरायण एवं देशभक्त विद्वान् के रूप में गढ़ा जाता है।
समाज में वैदिक धर्म एवं वैदिक साहित्य की चेतना जाग्रत करना, तथा गुरुकुल शिक्षा-पद्धति व आर्ष पाठ विधि को पुनर्जीवित कर व्यापक स्तर पर प्रोत्साहित करना।
देववाणी संस्कृत के माध्यम से वेद, ब्राह्मणग्रन्थ, दर्शन, उपनिषद्, निरुक्त एवं व्याकरण सहित समस्त वैदिक विषयों का अध्ययन महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा निर्धारित पद्धति से सम्पन्न कराना, तथा प्राचीन आश्रम-व्यवस्था के अनुसार अनुशासित दिनचर्या के माध्यम से बलशाली, सदाचारी, धर्मपरायण एवं देशभक्त विद्वानों का निर्माण करना है।
जिनके मार्गदर्शन एवं तप से यह गुरुकुल आगे बढ़ रहा है